Tuesday, October 27, 2015

आपकी सेवा में सदा के लिए

इस तरह के वाक्य अक्सर आपको ऐसी जगहों  पर  लिखे हुए मिल जाते है जिनका  सम्बन्ध  नागरिक सुविधाओं से है।  पर ये आपका आत्मविश्वास नहीं बढ़ाते। आपको ये भरोसा नहीं होता की आपका काम सुविधा से हो जायेगा।  इसका एक बड़ा कारण ये है कि काम तो बोर्ड पर लिखे वाक्य से होना नहीं है काम तो होना है वहां बैठे आदमी से। और आदमी की फितरत है कि जहाँ ऐसी कुर्सी मिली जहाँ थोड़ी सत्ता या अधिकार है तो फिर लोगों को और खुद को उसका स्वाद मिलना ही चाहिए। कुछ दिन पहले मुझे रिटायरमेंट के बाद वाला सी जी एच एस कार्ड बनवाना था।  फॉर्म भर कर शुल्क के साथ जमा करवा दिया। अब इसके दो महीने बाद कार्ड दिया जाना था जो की मुझे ग्रेटर नोएडा जाकर लेना था क्योंकि मेरा स्थाई पता वहां का था।  ये मुझे काफी झंझट का काम लग रहा था क्योंकि मेरा ये विश्वास था कि नोयडा में कोई काम आसानी से नहीं होगा यहाँ तक की बना हुआ कार्ड प्राप्त करना भी ।  इसी बीच एक दिन मुझे फ़ोन आया की आपका सी जी एच एस कार्ड बन गया है आकर ले जाये। मुझे इस फ़ोन के आने पर बड़ी ख़ुशी हुई। यू पी के सरकारी दफ्तर में लोग इतने कर्तव्यनिष्ट कि  आपको फ़ोन करके बताएं। एक शनिवार को मैंने अपने किसी काम के साथ इस काम को करने का तय किया।    मुझे क्योंकि इस काम के लिए आने जाने में नब्बे किलोमीटर की यात्रा करनी थी इसलिए ये ज़रूरी लगा की पूछ लिया जाये कि शनिवार के लिए समय कुछ अलग तो नहीं है। काफी प्रयास के बाद फ़ोन पर ये जानकारी मिल गयी कि दो बजे तक पहुचने पर कार्ड मिल जायेगा। खैर एक बजे डिस्पेंसरी पहुँचाने पर एक सज्जन जो की एक जालीदार काउंटर के पीछे विराजमान थे कार्ड के बारे में पूछने पर एक कागज़ पर तीन चार चीज़े लिख कर कहा कि वहां नोटिस बोर्ड पर लिस्ट लगी है वहां से ये सब नोट करके ले आइये आपको कार्ड उसके बाद मिल जायेगा। एक तो मुझे  जालीदार काउंटर का राज़ आज तक समझ में नही आया। और जब आपके सामने कंप्यूटर  रखा है तो ये जानकारी नोटिस बोर्ड के कागज़ों से मंगवानी क्यों ज़रूरी है। पर ये सवाल आप अगर  पूछ बैठे तो तयशुदा है कि आपकी मुश्किलें बढ़ने वाली है। तो ठीक यही  लगा कि नोटिस बोर्ड की लिस्ट से ज़रूरी सूचना नोट कर उन सज्जन को  दी जाये जिन्हे ये अधिकार मिला है कि वे हमें वरदान स्वरुप सी जी एच  एस कार्ड दे।  पर ये काम इतना आसान भी नहीं था। नोटिस बोर्ड पर कोई पांच -छः लिस्टें टंगी थी।  हर लिस्ट में पांच -छह पेज थे।  कुछ पेज छूते ही नीचे फर्श की ओर चले।  हर पेज पर 40 -50 नाम। खैर अपनी किस्मत अच्छी थी कि दूसरी लिस्ट में नाम मिल गया। पर जालीदार काउंटर पर जाकर पता चला कि किस्मत इतनी भी अच्छी नहीं हो सकती जब आप यू पी में सरकारी दफ्तर में हों। जालीदार काउंटर के पीछे के सज्जन वहां से गायब हो चुके थे।  उन्हें तलाश करने के प्रयास का कोई नतीजा नहीं निकला। तब तक एक बड़ी उम्र का कर्मचारी वहां आ कर विराजमान हो गया पर हमारे किसी सवाल को उसने जवाब के लायक नहीं समझा। कोई 15 मिनट बाद वे सज्जन प्रगट हुए और कागज़ उन्होंने निगाहे करम डालते हुए ग्रहण तो कर लिया और बताया बैठ जाइये आपको 15 -20 मिनट बाद हम खुद बुला लेंगे।गुस्सा तो आ रहा था। पर कर क्या सकते है। उन्हें चिढ़ाने के लिए हमने काउंटर  पर ही इंतज़ार करने का निश्चय किया। इसमें हुआ सिर्फ इतना की हमारा कागज़ उनकी टेबल पर हमारा मुंह चिड़ाते हुए पड़ा रहा। 15 -20 मिनट बाद उस कागज़ को उठाया गया।  आलमारी से रजिस्टर निकाला गया और कुछ निहायत ही बेवकूफी भरे सवाल पूछते हुए हमें सी जी एच एस कार्ड दे दिया गया। जब उनके  बेवकूफी भरे सवालों को समझने की कोशिश की गयी तो प्रतिकिया कुछ ऐसी थी की इतना भी नहीं पता अच्छा अब कार्ड ले और जाएं। किसी भी संस्था या कार्यालय के ऐसे अधिकारी या कर्मचारी   जिनका वास्ता आम  नागरिक से पड़ता है उनका कार्यकुशल और व्यवहारकुशल होना जितना नागरिकों के हित  में है उतना ही उस विभाग या संस्था की छवि के लिए भी ज़रूरी है।                                                                                    





Friday, October 2, 2015

घर संभालती स्त्री / आकांक्षा पारे

गुस्सा जब उबलने लगता है दिमाग में
प्रेशर कुकर चढ़ा देती हूँ गैस पर
भाप निकलने लगती है जब 
एक तेज़ आवाज़ के साथ
ख़ुद-ब-ख़ुद शांत हो जाता है दिमाग
पलट कर जवाब देने की इच्छा पर
पीसने लगती हूँ, एकदम लाल मिर्च
पत्थर पर और रगड़ कर बना देती हूँ
स्वादिष्ट चटनी

जब कभी मन किया मैं भी मार सकूँ 
किसी को
तब 
धोती हूँ तौलिया, गिलाफ़ और मोटे भारी परदे
जो धुल सकते थे आसानी से वॉशिंग मशीन में
मेरे मुक्के पड़ते हैं उन पर
और वे हो जाते हैं 
उजले, शफ़्फ़ाक सफ़ेद

बहुत बार मैंने पूरे बगीचे की मिट्टी को
कर दिया है खुरपी से उलट-पलट
गुड़ाई के नाम पर
जब भी मचा है घमासान मन में

सूती कपड़ों पर पानी छिड़क कर 
जब करती हूं इस्त्री
तब पानी उड़ता है भाप बन कर 
जैसे उड़ रही हो मेरी ही नाराज़गी
किसी जली हुई कड़ाही को रगड़ कर 
घिसती रहती हूँ लगातार
चमका देती हूँ 
और लगता है बच्चों को दे दिए हैं मैंने इतने ही उजले संस्कार

घर की झाड़ू-बुहारी में
पता नहीं कब मैं बुहार देती हूँ अपना भी वजूद
मेरे परिवार में, रिश्तेदारों में, पड़ोस में
जहाँ भी चाहें पूछ लीजिए
सभी मुझे कहते हैं
दक्ष गृहिणी।



खाना बनातीं स्त्रियाँ (Khana banatin striyan by Kumar Ambuj)


जब वे बुलबुल थीं उन्होंने खाना बनाया
फिर हिरणी होकर
फिर फूलों की डाली होकर
जब नन्ही दूब भी झूम रही थी हवाओं के साथ
जब सब तरफ़ फैली हुई थी कुनकुनी धूप
उन्होंने अपने सपनों को गूँथा
हृदयाकाश के तारे तोड़कर डाले
भीतर की कलियों का रस मिलाया
लेकिन आख़िर में उन्हें सुनाई दी थाली फेंकने की आवाज़

आपने उन्हें सुंदर कहा तो उन्होंने खाना बनाया
और डायन कहा तब भी
उन्होंने बच्चे को गर्भ में रखकर खाना बनाया
फिर बच्चे को गोद में लेकर
उन्होंने अपने सपनों के ठीक बीच में खाना बनाया
तुम्हारे सपनों में भी वे बनाती रहीं खाना
पहले तन्वंगी थीं तो खाना बनाया
फिर बेडौल होकर

वे समुद्रों से नहाकर लौटीं तो खाना बनाया
सितारों को छूकर आईं तब भी
उन्होंने कई बार सिर्फ़ एक आलू एक प्याज़ से खाना बनाया
और कितनी ही बार सिर्फ़ अपने सब्र से
दुखती कमर में, चढ़ते बुखार में
बाहर के तूफ़ान में
भीतर की बाढ़ में उन्होंने खाना बनाया
फिर वात्सल्य में भरकर
उन्होंने उमगकर खाना बनाया

आपने उनसे आधी रात में खाना बनवाया
बीस आदमियों का खाना बनवाया
ज्ञात-अज्ञात स्त्रियों का उदाहरण
पेश करते हुए खाना बनवाया
कई बार आँखें दिखाकर
कई बार लात लगाकर
और फिर स्त्रियोचित ठहराकर
आप चीखे - उफ़, इतना नमक
और भूल गए उन आँसुओं को
जो ज़मीन पर गिराने से पहले
गिरते रहे तश्तरियों में, कटोरियों में

कभी उनका पूरा सप्ताह इस खुशी में गुज़र गया
कि पिछले बुधवार बिना चीखे-चिल्लाए
खा लिया गया था खाना
कि परसों दो बार वाह-वाह मिली
उस अतिथि का शुक्रिया
जिसने भरपेट खाया और धन्यवाद दिया
और उसका भी जिसने अभिनय के साथ ही सही
हाथ में कौर लेते ही तारीफ़ की

वे क्लर्क हुईं, अफ़सर हुईं
उन्होंने फर्राटेदार दौड़ लगाई और सितार बजाया
लेकिन हर बार उनके सामने रख दी गई एक ही कसौटी
अब वे धकान की चट्टान पर पीस रही हैं चटनी
रात की चढ़ाई पर बेल रही हैं रोटियाँ
उनके गले से, पीठ से
उनके अन्धेरों से रिस रहा है पसीना
रेले बह निकले हैं पिंडलियों तक
और वे कह रही हैं यह रोटी लो
यह गरम है

उन्हें सुबह की नींद में खाना बनाना पडा
फिर दोपहर की नींद में
फिर रात की नींद में
और फिर नींद की नींद में उन्होंने खाना बनाया
उनके तलुओं में जमा हो गया है खून
झुकाने लगी है रीढ़
घुटनों पर दस्तक दे रहा है गठिया
उन्होंने शायद ध्यान नहीं दिया है
पिछले कई दिनों से उन्होंने
बैठकर खाना बनाना शुरू कर दिया है
हालाँकि उनसे ठीक तरह से बैठा भी नहीं जाता है l 

आकांक्षा पारे की कविता घर संभालती स्त्री और कुमार अम्बुज की कविता खाना बनाती स्त्रियां मेरी कुछ बहुत प्रिय कविताओं में है  शायद इस लिए भी की लगता है जैसे ये हमारी बात कह रही है। आज आपके लिए ये दो कविता।