Sunday, December 13, 2015

कोई बात नहीं

कोई बात नहीं। ये बड़ा अच्छा सा वाक्य है।  बड़े से बड़े झंझट को सहज ही निपटा देना।  कोई बात नहीं Let us move ahead. पर यही वाक्य बहुत बार हमारी मुसीबतों को बनाये रखता है।  क्योंकि हम गलत बातों को बर्दाश्त कर रहे होते। घर में बेटी किचेन में मदद करेगी। भाई और पिता के खाने की और दूसरे कामों की चिंता करेगी।  पति और पत्नी दोनों बाहर से आये है तो आते ही पति फ्रेश हो कर बैठेगा और टीवी देखेगा और पत्नी सीधे किचेन में जाकर चाय बनाएगी। अगर समाज की सोच के मुताबिक औरत कमज़ोर है तो आराम की तो उसे ज़रूरत है ना।  अभी एक दिन मैं अपनी मित्र से इसी पर चर्चा कर रही थी कि अब ये सब काम नहीं होते। इस पर उसने उदार भाव से कहा कोई बात नहीं। इतने सालों से तो कर ही रहे है ना। मेरा कहना है सालों से किसी काम को हम कर रहे है इसीलिए हम उसे सही नहीं मान ले।   सुबह होते ही नाश्ता बनाओ वह भी सबकी पसंद के  अनुसार। फिर दोपहर के खाने की चिंता करो।  उससे निपटो नहीं कि  शाम की चाय का समय हो गया।  चाय के साथ कुछ मिल जाये तो बहुत ही अच्छा।  फिर रात के खाने में लग जाओ। इस सारी प्रक्रिया में आप सबकी पसंद और स्वास्थ्य  का भी ख्याल रखे पर आपसे कोई ये भी नहीं  पूछेगा की आपने खाया या नहीं। और ये तो सिर्फ किचेन का काम है।  उसके अलावा आप बाहर  से सामान लाएं उसे ठीक से अरेंज करे। कब क्या घटा  इसका ट्रैक रखे। सबके कपडे धोएं सुखाये अरेंज करे। घर के सामानो की चिंता करे। टीवी फ्रिज मिक्सर पंखे बिजली सब ठीक रहे। ना ठीक हो तो करवाएं।  बिल भरें और ना जाने क्या क्या इस फेहरिस्त  मे जुड़ सकता है। और ये सब करने के साथ साथ आप नौकरी भी करें। बहुत बार इस तरह के सर्वे पढ़ने  को मिल जाते है कि औरतों के कामों को जो कि वोह चौबीस घंटे करती है अगर पैसों के भुगतान में देखा जाये तो कितना होगा। पर यहाँ तो आपको एक ऐसा इंसान मिला हुआ है जो इन सब कामों के लिए आपसे पैसे लेने के बजाये बाहर नौकरी करके आपके लिए  पैसे ला रहा है। आप चिंता न करें क्योंकि उसके बाद भी वह ये कहने को तैयार है कि
कोई बात नहीं.


Thursday, December 10, 2015

एक प्यारी सी  कविता जो कहती है हर माँ की कहानी .............माँ झूठ बोलती है...................
.सुबह जल्दी उठाने सात बजे को आठ कहती
 नहा लो, नहा लो, के घर में नारे बुलंद करती है ,
मेरी खराब तबियत का दोष बुरी नज़र पर मढ़ती
 छोटी परेशानियों का बड़ा बवंडर करती है  ..........माँ बड़ा झूठ बोलती है
थाल भर खिलाकर तेरी भूख मर गयी कहती है
जो मैं न रहू घर पे तो मेरे पसंद की
कोई चीज़ रसोई में उनसे नही पकती है ,
मेरे मोटापे को भी कमजोरी की सूज़न बोलती है .........माँ बड़ा झूठ बोलती है
दो ही रोटी रखी है रास्ते के लिए बोल कर
एक मेरे नाम दस लोगो का खाना भरती है,
कुछ नही-कुछ नही, बोल नजर बचा बैग में
छिपी शीशी अचार की बाद में निकलती है .....माँ बड़ा झूठ बोलती है
टोका टाकी से जो मैं झुंझला जाऊ कभी तो ,
समझदार हो अब न कुछ बोलूंगी मैं,
ऐसा अक्सर बोलकर वो रूठती है
अगले ही पल फिर चिंता में हिदायती होती है ....माँ बड़ा झूठ बोलती है
तीन घंटे मैं थियटर में ना बैठ पाउंगी ,
सारी फिल्मे तो टी वी पे आ जाती है ,
बाहर का तेल मसाला तबियत खराब करता है
बहानो से अपने पर होने वाले खर्च टालती है ....माँ बड़ा झूठ बोलती है
मेरी उपलब्द्धियो को बढ़ा चढ़ा कर बताती
सारी खामियों को सब से छिपा लेती है
उनके व्रत ,नारियल,धागे ,फेरे मेरे नाम
तारीफ़ ज़माने में कर बहुत शर्मिंदा करती है .... माँ बड़ा झूठ बोलती है
भूल भी जाऊ दुनिया भर के कामो में उलझ
उनकी दुनिया मैं वो मुझे कब भूलती है, ?
मुझ सा सुंदर उन्हें दुनिया में ना कोई दिखे
मेरी चिंता में अपने सुख भी नही भोगती है .........माँ बड़ा झूठ बोलती है
मन सागर मेरा हो जाए खाली ऐसी वो गागर
जब पूछो अपनी तबियत हरी बोलती है ,
उनके ‘जाये” है, हम भी रग रग जानते है
दुनियादारी में नासमझ वो भला कहाँ समझती है  .........माँ बड़ा झूठ बोलती है ....
उनकी फैलाए सामानों से जो एक उठा लू
खुश होती जैसे उन पे उपकार समझती है ,
मेरी छोटी सी नाकामयाबी पे गहरी उदासी
सोच सोच अपनी तबियत का नुक्सान सहती है ....माँ बड़ा झूठ बोलती है ...
( story of all mothers ....) someone shared it on what's  app.