Sunday, December 13, 2015

कोई बात नहीं

कोई बात नहीं। ये बड़ा अच्छा सा वाक्य है।  बड़े से बड़े झंझट को सहज ही निपटा देना।  कोई बात नहीं Let us move ahead. पर यही वाक्य बहुत बार हमारी मुसीबतों को बनाये रखता है।  क्योंकि हम गलत बातों को बर्दाश्त कर रहे होते। घर में बेटी किचेन में मदद करेगी। भाई और पिता के खाने की और दूसरे कामों की चिंता करेगी।  पति और पत्नी दोनों बाहर से आये है तो आते ही पति फ्रेश हो कर बैठेगा और टीवी देखेगा और पत्नी सीधे किचेन में जाकर चाय बनाएगी। अगर समाज की सोच के मुताबिक औरत कमज़ोर है तो आराम की तो उसे ज़रूरत है ना।  अभी एक दिन मैं अपनी मित्र से इसी पर चर्चा कर रही थी कि अब ये सब काम नहीं होते। इस पर उसने उदार भाव से कहा कोई बात नहीं। इतने सालों से तो कर ही रहे है ना। मेरा कहना है सालों से किसी काम को हम कर रहे है इसीलिए हम उसे सही नहीं मान ले।   सुबह होते ही नाश्ता बनाओ वह भी सबकी पसंद के  अनुसार। फिर दोपहर के खाने की चिंता करो।  उससे निपटो नहीं कि  शाम की चाय का समय हो गया।  चाय के साथ कुछ मिल जाये तो बहुत ही अच्छा।  फिर रात के खाने में लग जाओ। इस सारी प्रक्रिया में आप सबकी पसंद और स्वास्थ्य  का भी ख्याल रखे पर आपसे कोई ये भी नहीं  पूछेगा की आपने खाया या नहीं। और ये तो सिर्फ किचेन का काम है।  उसके अलावा आप बाहर  से सामान लाएं उसे ठीक से अरेंज करे। कब क्या घटा  इसका ट्रैक रखे। सबके कपडे धोएं सुखाये अरेंज करे। घर के सामानो की चिंता करे। टीवी फ्रिज मिक्सर पंखे बिजली सब ठीक रहे। ना ठीक हो तो करवाएं।  बिल भरें और ना जाने क्या क्या इस फेहरिस्त  मे जुड़ सकता है। और ये सब करने के साथ साथ आप नौकरी भी करें। बहुत बार इस तरह के सर्वे पढ़ने  को मिल जाते है कि औरतों के कामों को जो कि वोह चौबीस घंटे करती है अगर पैसों के भुगतान में देखा जाये तो कितना होगा। पर यहाँ तो आपको एक ऐसा इंसान मिला हुआ है जो इन सब कामों के लिए आपसे पैसे लेने के बजाये बाहर नौकरी करके आपके लिए  पैसे ला रहा है। आप चिंता न करें क्योंकि उसके बाद भी वह ये कहने को तैयार है कि
कोई बात नहीं.


Thursday, December 10, 2015

एक प्यारी सी  कविता जो कहती है हर माँ की कहानी .............माँ झूठ बोलती है...................
.सुबह जल्दी उठाने सात बजे को आठ कहती
 नहा लो, नहा लो, के घर में नारे बुलंद करती है ,
मेरी खराब तबियत का दोष बुरी नज़र पर मढ़ती
 छोटी परेशानियों का बड़ा बवंडर करती है  ..........माँ बड़ा झूठ बोलती है
थाल भर खिलाकर तेरी भूख मर गयी कहती है
जो मैं न रहू घर पे तो मेरे पसंद की
कोई चीज़ रसोई में उनसे नही पकती है ,
मेरे मोटापे को भी कमजोरी की सूज़न बोलती है .........माँ बड़ा झूठ बोलती है
दो ही रोटी रखी है रास्ते के लिए बोल कर
एक मेरे नाम दस लोगो का खाना भरती है,
कुछ नही-कुछ नही, बोल नजर बचा बैग में
छिपी शीशी अचार की बाद में निकलती है .....माँ बड़ा झूठ बोलती है
टोका टाकी से जो मैं झुंझला जाऊ कभी तो ,
समझदार हो अब न कुछ बोलूंगी मैं,
ऐसा अक्सर बोलकर वो रूठती है
अगले ही पल फिर चिंता में हिदायती होती है ....माँ बड़ा झूठ बोलती है
तीन घंटे मैं थियटर में ना बैठ पाउंगी ,
सारी फिल्मे तो टी वी पे आ जाती है ,
बाहर का तेल मसाला तबियत खराब करता है
बहानो से अपने पर होने वाले खर्च टालती है ....माँ बड़ा झूठ बोलती है
मेरी उपलब्द्धियो को बढ़ा चढ़ा कर बताती
सारी खामियों को सब से छिपा लेती है
उनके व्रत ,नारियल,धागे ,फेरे मेरे नाम
तारीफ़ ज़माने में कर बहुत शर्मिंदा करती है .... माँ बड़ा झूठ बोलती है
भूल भी जाऊ दुनिया भर के कामो में उलझ
उनकी दुनिया मैं वो मुझे कब भूलती है, ?
मुझ सा सुंदर उन्हें दुनिया में ना कोई दिखे
मेरी चिंता में अपने सुख भी नही भोगती है .........माँ बड़ा झूठ बोलती है
मन सागर मेरा हो जाए खाली ऐसी वो गागर
जब पूछो अपनी तबियत हरी बोलती है ,
उनके ‘जाये” है, हम भी रग रग जानते है
दुनियादारी में नासमझ वो भला कहाँ समझती है  .........माँ बड़ा झूठ बोलती है ....
उनकी फैलाए सामानों से जो एक उठा लू
खुश होती जैसे उन पे उपकार समझती है ,
मेरी छोटी सी नाकामयाबी पे गहरी उदासी
सोच सोच अपनी तबियत का नुक्सान सहती है ....माँ बड़ा झूठ बोलती है ...
( story of all mothers ....) someone shared it on what's  app.

Thursday, November 26, 2015

FOURTH ESTATE

The term fourth estate as we all know refers to print media/news.It is regarded as an important pillar of democracy. There was a time when people with great ideals commitment and duty towards society and nation opted for journalism. we read that press played a role in our freedom struggle. I remember newspaper had a very important place in our life. I can recall the first thing I wanted in the morning was a newspaper with a cup of tea and leisurely time of one  hour to read it with sips of hot tea. when my kids were in school I sat with my newspaper around 7 or 7.30 after sending them to school. Now I have full time but  the charm for newspaper is no longer there. How did it happen?
Why did it happen ?
An owner of a leading newspaper once said we are not in the business of news we are in advertising.
it's an honest confession. The weight of a leading English newspaper which often boasts of the highest readership sometimes  around half kg. when it's sale season first two or three pages on both sides are full page ads. Then sometimes the first page have a fold which makes it a four pages  full of  advertisements. At times one page is jutting out of  the regular size by two inches for ad so that you do not miss it. How could you when it is continuously irritating you because of it's sheer nonsensical
out-sized  presence. There are shiny and glossy supplement given to you along with  newspaper carrying only exclusive ads of big industry player. Then comes small classified ads tributes missing persons obituaries tender notices other notice etc etc. Gone are the days when headlines on the paper grabbed your eyes the moment newspaper was thrown at your door step. Now you start your day rummaging though sale offers.
As for news there are twisted political stories crime news of all sorts. Editors and journalists are agenda driven. Our sources reliable sources alleged are the words which give you the liberty to twist the stories. Good news is no news so twist the stories to the extent of nuisance or to suit the interest of your benefactors.                                                                                                                                       You get a news paper containing 30 to 40 pages but there is hardly any news worth reading. You flip through the news paper and it's finished before your tea. I really tried that I read the news on my phone in the morning. Though you find more latest news online but still it does not work. You need newspaper because it's a habit  acquired   over the years. I wish newspaper changed over the years had changed to our liking and they added some new dimensions to sustain readership who are hooked to them.

Tuesday, October 27, 2015

आपकी सेवा में सदा के लिए

इस तरह के वाक्य अक्सर आपको ऐसी जगहों  पर  लिखे हुए मिल जाते है जिनका  सम्बन्ध  नागरिक सुविधाओं से है।  पर ये आपका आत्मविश्वास नहीं बढ़ाते। आपको ये भरोसा नहीं होता की आपका काम सुविधा से हो जायेगा।  इसका एक बड़ा कारण ये है कि काम तो बोर्ड पर लिखे वाक्य से होना नहीं है काम तो होना है वहां बैठे आदमी से। और आदमी की फितरत है कि जहाँ ऐसी कुर्सी मिली जहाँ थोड़ी सत्ता या अधिकार है तो फिर लोगों को और खुद को उसका स्वाद मिलना ही चाहिए। कुछ दिन पहले मुझे रिटायरमेंट के बाद वाला सी जी एच एस कार्ड बनवाना था।  फॉर्म भर कर शुल्क के साथ जमा करवा दिया। अब इसके दो महीने बाद कार्ड दिया जाना था जो की मुझे ग्रेटर नोएडा जाकर लेना था क्योंकि मेरा स्थाई पता वहां का था।  ये मुझे काफी झंझट का काम लग रहा था क्योंकि मेरा ये विश्वास था कि नोयडा में कोई काम आसानी से नहीं होगा यहाँ तक की बना हुआ कार्ड प्राप्त करना भी ।  इसी बीच एक दिन मुझे फ़ोन आया की आपका सी जी एच एस कार्ड बन गया है आकर ले जाये। मुझे इस फ़ोन के आने पर बड़ी ख़ुशी हुई। यू पी के सरकारी दफ्तर में लोग इतने कर्तव्यनिष्ट कि  आपको फ़ोन करके बताएं। एक शनिवार को मैंने अपने किसी काम के साथ इस काम को करने का तय किया।    मुझे क्योंकि इस काम के लिए आने जाने में नब्बे किलोमीटर की यात्रा करनी थी इसलिए ये ज़रूरी लगा की पूछ लिया जाये कि शनिवार के लिए समय कुछ अलग तो नहीं है। काफी प्रयास के बाद फ़ोन पर ये जानकारी मिल गयी कि दो बजे तक पहुचने पर कार्ड मिल जायेगा। खैर एक बजे डिस्पेंसरी पहुँचाने पर एक सज्जन जो की एक जालीदार काउंटर के पीछे विराजमान थे कार्ड के बारे में पूछने पर एक कागज़ पर तीन चार चीज़े लिख कर कहा कि वहां नोटिस बोर्ड पर लिस्ट लगी है वहां से ये सब नोट करके ले आइये आपको कार्ड उसके बाद मिल जायेगा। एक तो मुझे  जालीदार काउंटर का राज़ आज तक समझ में नही आया। और जब आपके सामने कंप्यूटर  रखा है तो ये जानकारी नोटिस बोर्ड के कागज़ों से मंगवानी क्यों ज़रूरी है। पर ये सवाल आप अगर  पूछ बैठे तो तयशुदा है कि आपकी मुश्किलें बढ़ने वाली है। तो ठीक यही  लगा कि नोटिस बोर्ड की लिस्ट से ज़रूरी सूचना नोट कर उन सज्जन को  दी जाये जिन्हे ये अधिकार मिला है कि वे हमें वरदान स्वरुप सी जी एच  एस कार्ड दे।  पर ये काम इतना आसान भी नहीं था। नोटिस बोर्ड पर कोई पांच -छः लिस्टें टंगी थी।  हर लिस्ट में पांच -छह पेज थे।  कुछ पेज छूते ही नीचे फर्श की ओर चले।  हर पेज पर 40 -50 नाम। खैर अपनी किस्मत अच्छी थी कि दूसरी लिस्ट में नाम मिल गया। पर जालीदार काउंटर पर जाकर पता चला कि किस्मत इतनी भी अच्छी नहीं हो सकती जब आप यू पी में सरकारी दफ्तर में हों। जालीदार काउंटर के पीछे के सज्जन वहां से गायब हो चुके थे।  उन्हें तलाश करने के प्रयास का कोई नतीजा नहीं निकला। तब तक एक बड़ी उम्र का कर्मचारी वहां आ कर विराजमान हो गया पर हमारे किसी सवाल को उसने जवाब के लायक नहीं समझा। कोई 15 मिनट बाद वे सज्जन प्रगट हुए और कागज़ उन्होंने निगाहे करम डालते हुए ग्रहण तो कर लिया और बताया बैठ जाइये आपको 15 -20 मिनट बाद हम खुद बुला लेंगे।गुस्सा तो आ रहा था। पर कर क्या सकते है। उन्हें चिढ़ाने के लिए हमने काउंटर  पर ही इंतज़ार करने का निश्चय किया। इसमें हुआ सिर्फ इतना की हमारा कागज़ उनकी टेबल पर हमारा मुंह चिड़ाते हुए पड़ा रहा। 15 -20 मिनट बाद उस कागज़ को उठाया गया।  आलमारी से रजिस्टर निकाला गया और कुछ निहायत ही बेवकूफी भरे सवाल पूछते हुए हमें सी जी एच एस कार्ड दे दिया गया। जब उनके  बेवकूफी भरे सवालों को समझने की कोशिश की गयी तो प्रतिकिया कुछ ऐसी थी की इतना भी नहीं पता अच्छा अब कार्ड ले और जाएं। किसी भी संस्था या कार्यालय के ऐसे अधिकारी या कर्मचारी   जिनका वास्ता आम  नागरिक से पड़ता है उनका कार्यकुशल और व्यवहारकुशल होना जितना नागरिकों के हित  में है उतना ही उस विभाग या संस्था की छवि के लिए भी ज़रूरी है।                                                                                    





Friday, October 2, 2015

घर संभालती स्त्री / आकांक्षा पारे

गुस्सा जब उबलने लगता है दिमाग में
प्रेशर कुकर चढ़ा देती हूँ गैस पर
भाप निकलने लगती है जब 
एक तेज़ आवाज़ के साथ
ख़ुद-ब-ख़ुद शांत हो जाता है दिमाग
पलट कर जवाब देने की इच्छा पर
पीसने लगती हूँ, एकदम लाल मिर्च
पत्थर पर और रगड़ कर बना देती हूँ
स्वादिष्ट चटनी

जब कभी मन किया मैं भी मार सकूँ 
किसी को
तब 
धोती हूँ तौलिया, गिलाफ़ और मोटे भारी परदे
जो धुल सकते थे आसानी से वॉशिंग मशीन में
मेरे मुक्के पड़ते हैं उन पर
और वे हो जाते हैं 
उजले, शफ़्फ़ाक सफ़ेद

बहुत बार मैंने पूरे बगीचे की मिट्टी को
कर दिया है खुरपी से उलट-पलट
गुड़ाई के नाम पर
जब भी मचा है घमासान मन में

सूती कपड़ों पर पानी छिड़क कर 
जब करती हूं इस्त्री
तब पानी उड़ता है भाप बन कर 
जैसे उड़ रही हो मेरी ही नाराज़गी
किसी जली हुई कड़ाही को रगड़ कर 
घिसती रहती हूँ लगातार
चमका देती हूँ 
और लगता है बच्चों को दे दिए हैं मैंने इतने ही उजले संस्कार

घर की झाड़ू-बुहारी में
पता नहीं कब मैं बुहार देती हूँ अपना भी वजूद
मेरे परिवार में, रिश्तेदारों में, पड़ोस में
जहाँ भी चाहें पूछ लीजिए
सभी मुझे कहते हैं
दक्ष गृहिणी।



खाना बनातीं स्त्रियाँ (Khana banatin striyan by Kumar Ambuj)


जब वे बुलबुल थीं उन्होंने खाना बनाया
फिर हिरणी होकर
फिर फूलों की डाली होकर
जब नन्ही दूब भी झूम रही थी हवाओं के साथ
जब सब तरफ़ फैली हुई थी कुनकुनी धूप
उन्होंने अपने सपनों को गूँथा
हृदयाकाश के तारे तोड़कर डाले
भीतर की कलियों का रस मिलाया
लेकिन आख़िर में उन्हें सुनाई दी थाली फेंकने की आवाज़

आपने उन्हें सुंदर कहा तो उन्होंने खाना बनाया
और डायन कहा तब भी
उन्होंने बच्चे को गर्भ में रखकर खाना बनाया
फिर बच्चे को गोद में लेकर
उन्होंने अपने सपनों के ठीक बीच में खाना बनाया
तुम्हारे सपनों में भी वे बनाती रहीं खाना
पहले तन्वंगी थीं तो खाना बनाया
फिर बेडौल होकर

वे समुद्रों से नहाकर लौटीं तो खाना बनाया
सितारों को छूकर आईं तब भी
उन्होंने कई बार सिर्फ़ एक आलू एक प्याज़ से खाना बनाया
और कितनी ही बार सिर्फ़ अपने सब्र से
दुखती कमर में, चढ़ते बुखार में
बाहर के तूफ़ान में
भीतर की बाढ़ में उन्होंने खाना बनाया
फिर वात्सल्य में भरकर
उन्होंने उमगकर खाना बनाया

आपने उनसे आधी रात में खाना बनवाया
बीस आदमियों का खाना बनवाया
ज्ञात-अज्ञात स्त्रियों का उदाहरण
पेश करते हुए खाना बनवाया
कई बार आँखें दिखाकर
कई बार लात लगाकर
और फिर स्त्रियोचित ठहराकर
आप चीखे - उफ़, इतना नमक
और भूल गए उन आँसुओं को
जो ज़मीन पर गिराने से पहले
गिरते रहे तश्तरियों में, कटोरियों में

कभी उनका पूरा सप्ताह इस खुशी में गुज़र गया
कि पिछले बुधवार बिना चीखे-चिल्लाए
खा लिया गया था खाना
कि परसों दो बार वाह-वाह मिली
उस अतिथि का शुक्रिया
जिसने भरपेट खाया और धन्यवाद दिया
और उसका भी जिसने अभिनय के साथ ही सही
हाथ में कौर लेते ही तारीफ़ की

वे क्लर्क हुईं, अफ़सर हुईं
उन्होंने फर्राटेदार दौड़ लगाई और सितार बजाया
लेकिन हर बार उनके सामने रख दी गई एक ही कसौटी
अब वे धकान की चट्टान पर पीस रही हैं चटनी
रात की चढ़ाई पर बेल रही हैं रोटियाँ
उनके गले से, पीठ से
उनके अन्धेरों से रिस रहा है पसीना
रेले बह निकले हैं पिंडलियों तक
और वे कह रही हैं यह रोटी लो
यह गरम है

उन्हें सुबह की नींद में खाना बनाना पडा
फिर दोपहर की नींद में
फिर रात की नींद में
और फिर नींद की नींद में उन्होंने खाना बनाया
उनके तलुओं में जमा हो गया है खून
झुकाने लगी है रीढ़
घुटनों पर दस्तक दे रहा है गठिया
उन्होंने शायद ध्यान नहीं दिया है
पिछले कई दिनों से उन्होंने
बैठकर खाना बनाना शुरू कर दिया है
हालाँकि उनसे ठीक तरह से बैठा भी नहीं जाता है l 

आकांक्षा पारे की कविता घर संभालती स्त्री और कुमार अम्बुज की कविता खाना बनाती स्त्रियां मेरी कुछ बहुत प्रिय कविताओं में है  शायद इस लिए भी की लगता है जैसे ये हमारी बात कह रही है। आज आपके लिए ये दो कविता। 

Sunday, September 27, 2015

Aurat ka dil

The way to a man's heart is through his stomach.


इस मुहावरे का मतलब बताया गया है कि अगर आप पुरुष का प्रेम पाना चाहती है तो उसे अच्छा खाना परोसे। इसका ज़रा बेहतर मतलब देखा तो वो था - cooking food for a man is a good way to win his affection. पर एक बात तो साफ़ है कि ये मुहावरा पुरुष के दिल का  कोई अच्छा खाका नहीं पेश करता। अच्छा खा कर पकाने वाले पर फ़िदा हो जाने से तो ज़ाहिर है कि प्रेम कोई बहुत उत्कृष्ट कोटि का नहीं है। बावर्ची को भी उतनी ही आसानी से हासिल है जितना पत्नी को।  हमने तो सुना था कि इंसान जीने के लिए खाता है खाने के लिए नहीं जीता पर ये मुहावरा तो कुछ और ही बयान करता है। सबसे मज़ेदार बात तो ये है कि ये पुरुष जिन्हे भूख से कुछ ज़्यादा खिला कर और समय पर स्वादिष्ट खाना परोस कर ये औरतें  खुश हो रही होती है वो कभी यह नहीं सोचते कि ये जो औरत नाम का प्राणी है इसके अंदर भी एक दिल नाम की चीज़ है जिस तक पहुचने के लिए  किसी कोशिश की ज़रूरत है। कभी आपने कोई मुहावरा औरतों के दिल तक पहुचने के लिए पुरुषों को नसीहत देते सुना है ?

आज तो हमारा समाज महिलाओं की शिक्षा और कामकाजी होने को लेकर काफी बदल गया है। पर उनके घर के कामकाज को लेकर ज़िम्मेदारी कमोबेश वही है। आज भी वे घर में पका कर पतियों के टिफ़िन पैक करके आएँगी और ऑफिस से जाकर उनके लिए ताज़ा स्वादिष्ट खाना पकायेंगी और अपने को धन्य मानेगी। मुझे फिल्म इंग्लिश विंग्लिश का एक डायलॉग याद आ रहा है ---मौसी तुम लड्डू बनाने के लिए नहीं पैदा नही हुई हो।




Saturday, September 26, 2015

कहते है नाम मे क्या रखा है





शेक्सपियर ने कहा है कि गुलाब को किसी भी नाम से पुकारो उसकी सुगंध तो वही रहेगी। पर इस मुहावरे के मुताबिक क्या ये संभव है कि  आपको लोग किसी भी नाम से पुकार ले। नहीं ना। आप अपने जनम से ही एक खास नाम से पुकारे जाने के अभ्यस्त है। पर एक बात बताएं क्या हमारे जाने के बाद हमारी अगली पीढी हमें हमारे नाम से याद करेगी।  बिलकुल भी नही। वे हमें  याद करेंगे हमारी  माँ हमारी दादी हमारी  नानी हमारी बुआ या  मौसी या फिर एक मित्र। यानि आपके साथ   ही आपका नाम समाप्त। ज़्यादा से ज़्यादा एक दो पीढ़ियों के बाद वह भी ख़त्म।



पर घर वाले भले ही याद न रखे पर सत्ता से जुड़े  लोगों की यह इच्छा ज़रूर रहती है कि फलां  जगह या सड़क का नाम उनके घर के फलां व्यक्ति के नाम पर रख दिया जाये। हमारे इतिहास में अनेक लोग ऐसे है जिन्हे हम उनके कामों या महत्वपूर्ण  योगदान  की  वजह से जानते है पर ऐसे लोग भी कम नहीं जिनके नाम पर सड़कें है जिनसे गुज़रते हुए हम सोचते है भई ये कौन थे इन्होने किया क्या था और हमें किस काम के लिए इन्हे याद करना है । मुझे पता नहीं हुकमी बाई कौन थी या  हरसुख चौधरी कौन थे। गूगल  शायद  ही इस काम में आपकी मदद कर पाये और इतिहास की किताब तो कतई नहीं करेगी। बहुत ढूंढने पर शायद उस एरिया का कोई बुज़ुर्ग आपको कुछ बता सके पर वह भी पक्का नहीं। पर ये तो सिर्फ उदहारण है। हिन्दुस्तान में जवाहर लाल नेहरू इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नाम पर सड़कों चौराहों भवनो शिक्षा संस्थानों और सरकारी योजनाओ की अगर  गिनती करने लगें तो भारत से अनजान किसी व्यक्ति के लिए इस विश्वास से बचना मुश्किल हो जायेगा कि भारतवर्ष नाम के इस प्राचीन देश में इनसे ज़्यादा योगदान वाली कोई और हस्तियां भी रही है।  जो लोग नहीं है उनके बारे में विवाद खड़ा करना कोई अच्छी बात नहीं है पर यह समझना मुश्किल है कि माधवराव   सिंधियां या राजेश पाइलट के नाम पर सड़कें क्यों होनी चाहिए। हाल ही में सरकार ने औरंगज़ेब  रोड का नाम बदल कर अब्दुल्ल  कलाम  रोड रख दिया है। ना तो भारत के इतिहास में औरंगज़ेब कोई बहुत लोकप्रिय शासक रहा है और ना ही अबदुल कलाम सड़क की वजह से जाने जायेंगे। तो फिर इस सारी 
कवायद का मतलब क्या है। पिछले दिनों कितने लोग इसको लेकर व्यस्त रहे।  कुछ लोग औरंगज़ेब  की खूबियां गिनाते नज़र आये तो कुछ को लगा अब्ब्दुल्ल कलाम के देशप्रेम का गुणगान उनके द्वारा ज़रूरी है। जो नहीं रहे वे तो अपने काम से ही याद किये जायेंगे पर जो ज़िंदा है उन्हें ज़रूर चर्चा में बने रहने के लिए मुद्दे मिल जाते है।  बदनाम जो होंगे अगर तो क्या नाम न  होगा।