Saturday, September 26, 2015

कहते है नाम मे क्या रखा है





शेक्सपियर ने कहा है कि गुलाब को किसी भी नाम से पुकारो उसकी सुगंध तो वही रहेगी। पर इस मुहावरे के मुताबिक क्या ये संभव है कि  आपको लोग किसी भी नाम से पुकार ले। नहीं ना। आप अपने जनम से ही एक खास नाम से पुकारे जाने के अभ्यस्त है। पर एक बात बताएं क्या हमारे जाने के बाद हमारी अगली पीढी हमें हमारे नाम से याद करेगी।  बिलकुल भी नही। वे हमें  याद करेंगे हमारी  माँ हमारी दादी हमारी  नानी हमारी बुआ या  मौसी या फिर एक मित्र। यानि आपके साथ   ही आपका नाम समाप्त। ज़्यादा से ज़्यादा एक दो पीढ़ियों के बाद वह भी ख़त्म।



पर घर वाले भले ही याद न रखे पर सत्ता से जुड़े  लोगों की यह इच्छा ज़रूर रहती है कि फलां  जगह या सड़क का नाम उनके घर के फलां व्यक्ति के नाम पर रख दिया जाये। हमारे इतिहास में अनेक लोग ऐसे है जिन्हे हम उनके कामों या महत्वपूर्ण  योगदान  की  वजह से जानते है पर ऐसे लोग भी कम नहीं जिनके नाम पर सड़कें है जिनसे गुज़रते हुए हम सोचते है भई ये कौन थे इन्होने किया क्या था और हमें किस काम के लिए इन्हे याद करना है । मुझे पता नहीं हुकमी बाई कौन थी या  हरसुख चौधरी कौन थे। गूगल  शायद  ही इस काम में आपकी मदद कर पाये और इतिहास की किताब तो कतई नहीं करेगी। बहुत ढूंढने पर शायद उस एरिया का कोई बुज़ुर्ग आपको कुछ बता सके पर वह भी पक्का नहीं। पर ये तो सिर्फ उदहारण है। हिन्दुस्तान में जवाहर लाल नेहरू इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नाम पर सड़कों चौराहों भवनो शिक्षा संस्थानों और सरकारी योजनाओ की अगर  गिनती करने लगें तो भारत से अनजान किसी व्यक्ति के लिए इस विश्वास से बचना मुश्किल हो जायेगा कि भारतवर्ष नाम के इस प्राचीन देश में इनसे ज़्यादा योगदान वाली कोई और हस्तियां भी रही है।  जो लोग नहीं है उनके बारे में विवाद खड़ा करना कोई अच्छी बात नहीं है पर यह समझना मुश्किल है कि माधवराव   सिंधियां या राजेश पाइलट के नाम पर सड़कें क्यों होनी चाहिए। हाल ही में सरकार ने औरंगज़ेब  रोड का नाम बदल कर अब्दुल्ल  कलाम  रोड रख दिया है। ना तो भारत के इतिहास में औरंगज़ेब कोई बहुत लोकप्रिय शासक रहा है और ना ही अबदुल कलाम सड़क की वजह से जाने जायेंगे। तो फिर इस सारी 
कवायद का मतलब क्या है। पिछले दिनों कितने लोग इसको लेकर व्यस्त रहे।  कुछ लोग औरंगज़ेब  की खूबियां गिनाते नज़र आये तो कुछ को लगा अब्ब्दुल्ल कलाम के देशप्रेम का गुणगान उनके द्वारा ज़रूरी है। जो नहीं रहे वे तो अपने काम से ही याद किये जायेंगे पर जो ज़िंदा है उन्हें ज़रूर चर्चा में बने रहने के लिए मुद्दे मिल जाते है।  बदनाम जो होंगे अगर तो क्या नाम न  होगा। 

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